सबसे पहले मेरे सभी मुसलमान भाई और बेहनोंको मै ईद के मौके पर दहेदिल से हार्दीक शुभकामनाए देता हूँ. हरसाल की तरह ईस साल भी काज्या के घर शिरकुर्मा खाने को गया था. काज्या मेरे बचपण का दोस्त हैं. दरअसल उसका नाम ईसरार काजी हैं लेकीन बचपन से हम सब दोस्त उसे काज्या केहते हैं. धंदा और व्यवहार उसको बोहोत अच्छा जमता हैं. उसकी बीबी स्कूल टिचर हैं ईसलिऐ फिलहाल वो मुबई मे रहेता हैं लेकीन जब भी कभी आता हैं, मुझे मिले बीना नही जाता. हमारा आधा बचपन गाँव के नारकर की वाडे मैं खेलते खेलते गुजरा. अगर कुछ अच्छा सिख लेता तो आज वो आय आयटी मे इंजिनीअर बन चुका होता. लेकीन दसवी के बाद उसने आय टी आय किया और फिर ईधर उधर कारखानों मै छोटी मोठी नोकरी कीई और छोडभी दिई. गाँव के स्कूल मै नोकरी मिलेगी ईसलिए वहाँपेभी बीनपगारी काम करता रहा. आखीर शादी के बाद वो बीबीके साथ मुंबई चला गया. खुद की कमाईके चार पैसे कमाने के लिए अभी एक स्वीफ्ट डिझायर मुंबई मै दौडा रहा हैं और खुदमे के एक बेहरतरीन इलेक्ट्रीकल इंजिनिअरको ब्रेक लगा रहा हैं.

काज्या मे हर एक चीज का प्राक्टीकल नाॅलेज कुट कुट के भरा हैं. बात कोईभी हो, ये बंदा दिमाग लगाकर कुछ अच्छा सोल्युशन जरूर देगा. गाडीयाँ, बँक, ईलेक्ट्रीक चीजे, कन्स्ट्रक्शन और दुकान; ईसमेका काज्या का नाॅलेज बढीया हैं. बचपन से लेके आज तक उससे मै बोहत कुछ सिखता आया हूँ. हमारे गाँव मै बाबू काजी एक ऐसा शक्स हैं जिसने तलाठी ऑफीसके सामने हरएक प्रकारका दुकान चलाया. उनके बच्चोंनेभी तन, मन लगाके पापाको साथ दिया. अभी उनका एक किराणा दुकान हैं. काज्या के घर शिरकुर्मा पिते-पिते अब पच्चीस साल हो गए, उसके प्यार मे जरासी कमी नही आयी. मुसलमानोंके यहाँ ईद मनाई जाती है और ईदके दिन शिरकुर्मा और गुलगुले होते है ये बात जिंदगी मे सबसे पेहले काज्याके वजहसे मालूम पडी ईसिलिये ईद और काज्या के गुलगुले की मेरे जीवन मे जादा अहमियत हैं. जिंदगी के हर गम को खुशी के शिरकुर्मे मे डुबो डुबो के घुलमिलाओ फिर देखो ईन दोनोंसे अपनी जिंदगीभी कैसे मिठी हो जाती हैं. खुदा हाफ़िज़

लेखक : प्रा.विशाल गरड (पांगरीवाले)
दिनांक : १६ जून २०१८ – रमजान ईद